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75
۞ وَمِن أَهلِ الكِتابِ مَن إِن تَأمَنهُ بِقِنطارٍ يُؤَدِّهِ إِلَيكَ وَمِنهُم مَن إِن تَأمَنهُ بِدينارٍ لا يُؤَدِّهِ إِلَيكَ إِلّا ما دُمتَ عَلَيهِ قائِمًا ۗ ذٰلِكَ بِأَنَّهُم قالوا لَيسَ عَلَينا فِي الأُمِّيّينَ سَبيلٌ وَيَقولونَ عَلَى اللَّهِ الكَذِبَ وَهُم يَعلَمونَ

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं